Saturday, June 5, 2010

चाय और राजनीती बहुत घंचक्कड़ है

आज राजनीती फिल्म देखर बहुत अच्छा लगा...प्रकाश झा जी को राजनीती की समझ तो है शायद मोहरों की नहीं....बात उन दिनों की है जब मै स्कूल में पढता था और छुट्टियों में कभी कभी गाँव जाता था...गाँव में अपना एक अलग ही राजनीती होता था उस टाइम....ये बात मै १९९४-५ का कर रहा हु...मेरे गाँव में चाय वाला होता था पिछरी जाती का....गाँव के सभी बड़े बाबु साहेब लोगो का जामवारा वही हुआ करता था ...कोई नेता जी...कोई मास्टरजी...को किरानी...कोई डीलर साहेब.....दबे आवाज़ में किसी की बीबी से सुना की लोगो को चाय कम चाय वाले की ४ बेटिया ज्यादा पसंद आती थी....कुछ लोग तो जिंदगी का पहला चाय वही पीते थे....और कुछ लोगो का तो खानदानी बैठक हुआ करता था वो चाय का दुकान....जैसा बाप वैसा बेटा...कहने को बाबु साहेब ....और नीच जात ....घर का पानी पीना पसंद नहीं था पर चाय अच्छा लगता था नीच जात का...बाप बेटा सब एक साथ पीते....एक बात मै ये कहना चाहूँगा की उस चाय वाले की बेटिया कही से नीच जात की बेटी नहीं लगती थी....शायद ये चाय का कमाल था.....समय ने करवट ली ....पिछरों का नेता हर १ किलोमीटर की दुरी पर कही चाय की दुकान पर पलने लगा....वही ताजगी वही दम...वही रोब वही वही तेवर....अब लोगो को अपना ही चाय पीका लगने लगा था....मुह जल जाता था ......सही कहा अँगरेज़ तो चले गए पर कुछ चीज़े ऐसी छोड़ गए जो सचमुच भारत को इंडिया बना सका....नहीं तो हम आज भी कही उंच नीच में दब कर रह जाते....ये चाय तो कमाल कर गयी....:) भगवान का लाख लाख शुक्रिया मै उस चाय पिने वाले पीढ़ी से नहीं आता....कोई अफ्शोश भी नहीं है....क्योकि अब तो चाय साथ साथ बनाने और पिने का परम्परा चल पड़ा है .....कभी चाय से पड़ेसान हो तो काफ्फी भी उपलब्ध है जो पहले कभी सिर्फ राजा महाराजाओ को नसीब हुआ करता था ......यहाँ मेरा मकसद किसी चाय वाले या चाय पिने वालो को ठेस पहुचना नहीं है...मै तो सिर्फ चाय का सही रंग दिखाने की एक छोटी सी कोशिस कर रहा हु...आशा है आपलोगों को मेरी ये चाय पार्टी अच्छी लगे .....बुरा भी लगे तो मुझे कोई गम नहीं .....मुझे कोसने से पहले एक बार किसी चाय दुकान पर जाकर उस बर्तन को देखिएगा जिसमे चाय बनता है....पेंदी काला और ऊपर सफ़ेद...अब कौन काला और कौन सफ़ेद सब समझ का चक्कर है......शुक्रिया :)