जिंदगी को मौत का डर हो गया है
अब जिंदगी को ज़ीने का आस चाहिए
क्या यही विधि का विधान है
अब तो सूर्य को भी प्रकाश उधार चाहिए |
डरता रहा है जिंदगी मौत से अब तक
रौशनी के लिए चाहिए सूर्य को दीपक
मुझे तो लगता है ऐसा की अब
फूलो को भी खुसबू उधार चाहिए |
मिट रही है मानवता हिंसा का बोलबाला है
धर्म हो रही है सीथल अधर्म की चाल से
लगता नहीं ऐसा की धर्म अवतार लेने वाला है
अब तो भगवान को भी भक्त उधार चाहिए |
बढ़ रही है प्यास लक्ष्मी के लिए
सरस्वती है उदास भक्ति के लिए
सागर से बनी नदिया बाढ़ लाने वाली है
अब तो समुन्दर को भी पानी उधार चाहिए |
सिमट रही है धरती आकास
विज्ञानं की चमत्कार से
मुझे तो चाँद पर घर बना है
अब तो धरती को भी विस्तार चाहिए |
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