Thursday, February 4, 2010

बचपन की आँचल

बचपन होती बङी निराली
चंचल मन होठो पर गाली
हर दिन लगता है वसंत
हर एक दिन लगता है दिवाली |

मिलते ही परदेसी गुडिया
माँ लगने लगती है बुढ़िया
भूल गए बचपन की गलिय
और वो माँ की लोरिया |

माँ का दूध लगता अब कर्ज है
कीमत चूका दिया क्या हर्ज़ है
क्यू जमाना हो रहा है पागल
क्यों भूल गए बचपन की अंचल |

No comments:

Post a Comment