फिर एक बार बात चली है गुजरात, मोदी और अमीताभ की तो मुझे याद आ गया ओ भयानक भूकंप | ये कविता मैने उसी टाइम लिखा था, आज भी नहीं भूलता वो television पर दिखाए गए भयानक मंज़र, आज भी रोंगटे खड़े हो जाते है |
एक नयी सुबह थी, भोर थी
हर आँखों में सुबह की तलाश
बिधाता रच रहे थे नयी जिन्दगिया
मौत घूम रहा था आसपास |
ढह गयी मंदिर-मस्जिदे
बन गयी मलबो के समान
राम-रहीम एक साथ मिले
खुस हो रहा धरती आसमां |
खून बह रहा था नदियों के समान
नारा लगा रहा था की हमने आज़ादी पाई है
कल तक तो हम मिल ना सके
पर अब तो भाई-भाई है |
खुश हो रहे थे गांधीजी
प्रकृति के इस खेल से
जल रहे थे जलने वाले
मानवता की इस मेल से |
मौत भी थर्रा गयी अपने ही शोर से
जिंदगी बन गया भिखारी
हे खुदा मुझे मौत दे दो मगर
मौत हँस रहा था जोर से |
धरती पर स्वाधीनता की
नई उमंगे छाई थी पर
यमराज थे बड़ी ब्याकुल
काम बढ़ आई थी |
गांधीजी की जन्मभूमि और
धरती यह गुजरात है
आओ मिलजुल साथ चले
लाशो की बारात है |
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