दिन भर साइकिल पर सवार
बाजारों का चक्कर लगाना
दौर कर ट्युशन जाना तो
दौर कर कंप्यूटर इंस्टिट्यूट जाना
यही मेरी दिनचर्या थी |
रात की तो बात निराली
कभी अंधेरिया कभी दिवाली
बिजली के संग खेले आंख मिचौली
मच्छर के संग बिस्तर पर कबड्डी
मच्छरदानी तो मेरी तकिया थी |
दोस्त बोलते क्यू खेलते हो मच्छरो से ऐसा खेल
मै बोलता यार ! मच्छरदानी मुझे लगता है जेल
वो बोलते मत करो दोस्ती मच्छरो से हो जाओगे बीमार
मै कहता छोडो यार हो जाने दो कालाजार
मुझे दोस्तों की बात लगती घटिया थी |
मेरा मानना था ये मच्छर नहीं सुभाष चन्द्र बोस है
ये मच्छरो की झुण्ड नहीं आज़ाद हिंद फ़ौज है
ये कहते है तुम मुझे खून दो मै तुम्हे रात भर जगाऊंगा
कॉलेज में तो होती नहीं पढाई मै तुम्हे पढाउगा
गुरु शिष्य की यह रिश्ता बहुत पुरनिया थी |
दिमाग तो मेरा उस समय खुला
जब मच्छरो का खून मेरे खून से घुला
यहाँ तक तो सब ठीक ठाक चल रहा था
लेकिन रोज शाम को मेरा शारीर हिट हो रहा था
मेरे शारीर की हालत वैसी थी जैसे ४७ मोडल फटफटिया थी |
मच्छरो से तो हो गया था मुझे नफरत
फिर भी ओ आ जा रहे थे
गुरु तो थे ही ओ खून का भी रिश्ता बना रहे थे
मेरे ही खून पी कर मुझे ललकार रहे थे
मैंने भी जेहाद का एलान कर दिया |
चार मच्छरो को चौकी के उत्तरी सीमा पर मार गिराया
उसी दिन हमने चौकी पर सुरक्षा घेरा लगाया
मैंने सोचा अहह ! जिन्हें जेल में होना चाहिए
ओ बाहर गुनगुना रहे है
और मै बेबस बेचारा जेल की हवा खा रहे है |
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

likhte raho dost...
ReplyDeleteachha hai
dafaa512.blogspot.com
बहुत हीं मजेदार, पढ़कर मजा आ गया ।
ReplyDeleteशुभकामनायें ।
दिन भर साइकिल पर सवार
ReplyDeleteबाजारों का चक्कर लगाना
दौर कर ट्युशन जाना तो
दौर कर कंप्यूटर इंस्टिट्यूट जाना
यही मेरी दिनचर्या थी |
Ha,ha!